Monday, July 15, 2013

अश्क

क्यों ये अश्क बहे जा रहे है ,
किसी बात का गम, या कोई खयाल  सता रहे है,

क्या कोई मुसीबत आ पड़ी तुमपे ,
या कोई बात तुम्हे अन्दर ही अन्दर खाए जा रही है ,
किसी बात का दुःख ,
या बदल गए है तुम्हारे ही किस्मत का रुख

आखिर क्यों ये अश्क बहे जा रहे है ,
किसी बात का गम , या कोई ख़याल सता रहे है

यू तोह सबके दिल टूटे है ,
तुम्हे क्या लगा, सिर्फ तुमसे ही यह किस्मत रूठे है
रिश्तों के भवर में न पड्डो तुम ,
पता भी न चलेगा , कब इसके नशे में हो जाओगे गुम

फिर क्यों यह अश्क बहे जा रहे है ,
किसी बात का गम , या फिर कोई ख़याल सता रहे है

देखो सब यही आस लगाये है ,
की कब सूरज की किरण दिखे ,
तोह उनके डूबते घरो का पानी सूखे ,
किसी बच्चे की बह चुकी नाव उसे मिले ,
उस किसान की फसल अछे से खिले

यु तोह तुम हवाओ के साथ समयोजित्त हो जाते हो ,
कभी इस शहर तोह कभी उस शहर चलते जाते हो ,
फिर आज क्या बात हो गयी है ,
क्या इतनी लगाव तुम्हे इस जगह से हो गयी है

अगर नहीं ,
तोह फिर क्यों यह अश्क बहे जा रहे है ,
किसी बात का गम , या फिर कोई ख़याल सता रहे है 


4 comments:

GvSparx - laugh and love said...

देखो सब यही आस लगाये है ,
की कब सूरज की किरण दिखे ,
तोह उनके डूबते घरो का पानी सूखे ,
किसी बच्चे की बह चुकी नाव उसे मिले ,
उस किसान की फसल अछे से खिले

liked this part a lot :)

Megha said...

Wow second half is too good. You should write more Hindi poems.

Ms Clouds said...

@GvSparx: Yup...dats d main n highlighting part of the poem :)

@Megha: Thank u. Will surely try :)

Rafaa Dalvi said...

Wow Megha. It is brilliant. Keep writing :)